द लेजेंड ऑफ़ भगतसिंह से चौहान तक : कैसे हिन्दी सिनेमा ने अपना नैतिक क़ुतबनुमा खोया

बिमल रॉय की दो बीघा ज़मीन, जिसमें एक अमीर और युवा दम्पत्ति दो रिक्शावालों के साथ यूँ दौड़ लगाते हैं कि मानो वे बैट्री पर चलने वाले खिलौने हों जब तक कि उनमें से एक थककर गिर नहीं पड़ता है, इस फ़िल्म के तक़रीबन 73 साल बाद हमने हाल ही में टिर्री प्रैंक देखा। इसमें शरारत करने वाले लोग बैटरी-मैनेजमेंट ऐप्स के ज़रिये ई-रिक्शाओं को दूर बैठे ही बन्द कर देते हैं, रिक्शाचालकों को बीच रास्ते बेबस और कई बार रोता हुआ छोड़ते हुए।

द लेजेण्ड ऑफ़ भगतसिंह (2002) का आख़िरी दृश्य अजय देवगन की आँखों का क्लोस-अप था। आज़िम। बसीर। देश की रूह में झाँकता। हमें उन कुर्बानियों और बहदुरी की याद दिलाता जिसके दम पर हमें आज़ादी मिली। और अब वही अजय देवगन एक ऐसा किरदार निभा रहे हैं जो कश्मीरियों की आँखों पर पेलेट गंस से निशाना साधने के पक्ष में खड़ा है। जहाँ भारतीय नागरिकों का आंशिक या पूर्ण रूप से अंधा हो जाना, राष्ट्रवाद के इस नए संस्करण के सामने कोई क़ीमत नहीं रखता।

एक साम्राज्यवादी विदेशी सत्ता के ख़िलाफ़ एकजुट नाफ़रमानी से जन्मी भारत की परिकल्पना अब भारतीय नागरिकों के प्रति क्रूरता के प्रदर्शन तक सिमटकर रह गयी है। आज ऐसा महसूस होता है कि हमें ऐसी व्यवस्था पर गुमान होने लगा है, जो अपनी धुन में लोगों के घरों को ढहा देती है, कैमरे के सामने होने वाली मॉब लिंचिंग को नज़रअंदाज़ करती है, नफ़रती बयानबाज़ी और अपने ही देशवासियों के अमानवीयकरण को मान्य बना देती है।

अजय देवगन का अवसरवादी सिनेमा का हिस्सा बन जाना, हालाँकि, एक हालिया परिघटना है। उनकी सिंघम रिटर्न्स (2014) में सूफ़ी पीर को समर्पित एक गीत था, और फ़िल्म का खलनायक एक भ्रष्ट धर्मगुरु था।

ये 2014 की बात है, तब तक उन्हें बदलाव की भनक नहीं लगी थी। लज्जा (2001) जहाँ वह एक ऐसे डकैत के किरदार में थे जो ऊँची जाति के लोगों द्वारा उत्पीड़न से महिलाओं की रक्षा करते थे, से द लेजेण्ड ऑफ़ भगतसिंह जिसमें भारत को अवाम से जोड़ा गया, से हल्ला बोल (2008) तक, जिसमें उन्होंने सफ़दर हाशमी की याद दिलाने वाले एक क्रान्तिकारी के शिष्य की भूमिका निभायी थी; से तान्हाजी: द अनसंग वॉरियर में खुलेआम किये गये ऐतिहासिक पुनर्लेखन और अब चौहान तक—देवगन ने एक लम्बा सफ़र तय किया है। तान्हाजी की कामयाबी यह दिखाती है कि देवगन ने अब मुफ़ीद विषय ढूँढ लिया है, जिसमें अनन्त सम्भावनाएँ मौजूद हैं।

सिनेमा सम्बन्धी आदर्शों में सोचा-समझा बदलाव 

पोस्टर में एक चौहान द्वारा एक पठान पर किये गये तंज़ को भी नज़रअंदाज़ न करें। यह तंज़ इरादतन है। यह फ़िल्मी दुनिया के भीतर और उसके बाहर भी एक साफ़ संघर्ष की रेखा खींचता है। इसमें कई संस्तरों पर अर्थ निहित हैं, और इसके धार्मिक तथा जातिगत इशारों को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है।

यह राहुल रवैल की अर्जुन (1985) और राम गोपाल वर्मा की शिवा (1990) के दौर से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करता है। जो दो ऐसे नायकों की कहानियाँ, जिनके नाम तो पौराणिक पात्रों पर आधारित थे, लेकिन जो न तो प्रोपगैंडिस्ट थे, न ही नफ़रत के सौदागर बल्कि ऐसे अकेले सिपाही थे, जो अपराध और राजनीति के गठजोड़ के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे।

इन फिल्मों में अल्पसंख्यकों को खलनायक के तौर पर पेश करता कोई सबटेक्स्ट नहीं था, क्योंकि दोनों फ़िल्मों के नायक भी हमारी ही तरह अल्पसंख्यकों की स्थिति में थे और भ्रष्ट, हिंसक तथा जोड़-तोड़ करने वाले सत्ता-लोभी लोगों की भारी संख्या से घिरे हुए थे। दोनों फिल्मों ने यह दिखाया कि किस तरह ताकतवर राजनेता युवाओं को गुण्डागर्दी की ओर आकृष्ट करते हैं और अपना मक़सद पूरा हो जाने के बाद उन्हें दूध में पड़ी मक्खी की तरह फेंक देते हैं।

उनके शुरुआती हथियार क्या थे? एक साइकिल की चेन। और लाठियाँ। राज्यसत्ता का सहारा नहीं।

2021 में आयी अक्षय कुमार की सूर्यवंशी ने भी, चौहान की ही तरह, ऐसे पोस्टर के ज़रिये गर्व से घोषणा की थी— “आ रही है पुलिस”—जिसमें युद्ध की पोशाक पहने, बिना चेहरे वाली आकृतियों की भीड़ दिखायी गयी थी। यह वह दौर था जो जामिया की लाइब्रेरी पर हुए हमले के बाद आया था, और जब सीएए-विरोधी तथा किसान आन्दोलनों के दौरान पुलिस की भूमिका सामने आ चुकी थी।

ऐसी फिल्में, कुछ हद तक अमेरिकन स्नाइपर, रैम्बो और फर्स्ट ब्लड की तरह, एक ऐसी एकरूप राष्ट्रीय पहचान स्थापित करती हुई लगती हैं, जिसे एक सीधे तौर पर बन्दूक-धारी राष्ट्रवाद ताकत देता है—ऐसा राष्ट्रवाद जो विभाजनों, अगर वे मौजूद हों, तो उनके मूल कारणों के प्रति आँखें मूँद लेता है।

सहज सहानुभूति का मिटाया जाना

हालाँकि, बहुत समय पहले की बात नहीं है जब सहानुभूति हमारे भीतर और सिनेमा में स्वाभाविक रूप से मौजूद थी। मसलन, अर्जुन में मुख्य पात्र (जिस भूमिका को सनी देओल ने निभाया है) को पता चलता है कि उसके मृत दोस्त की बहन को वेश्यावृत्ति में धकेल दिया गया है। यह ख़बर देने वाला व्यक्ति खुशी-खुशी ठहाका लगाता है और उसके लिए एक गाली का इस्तेमाल करता है। अर्जुन, जैसा कि उस दौर के नायक करते थे, उस व्यक्ति को इस बात के लिए फटकारता है कि वह एक त्रासदी पर हँस रहा है और उसे ख़ुद की बहन को उसी परिस्थिति में रखकर कल्पना करने को कहता है। तब हम कमज़ोर लोगों पर हँसते नहीं थे।

यहाँ तक कि घायल (1990) का बन्दूकधारी, क़ानून हाथ में लेने वाला नायक भी सहानुभूति से भरा हुआ था। राजकुमार संतोषी की इस फ़िल्म ने खुले तौर पर दिखाया था कि किस तरह एक भ्रष्ट और राजनीतिक प्रभाव का शिकार “तंत्र” पुलिस को पंगु बना देता है और अपराधियों को संरक्षण देता है।

एक दृश्य में एक पुलिस अधिकारी एक युवा छात्र को थप्पड़ मार देता है तब नायक उस चुपचाप रो रहे लड़के से कहता है, “इन आँसुओं को संभालकर रखो। एक दिन यही आँसू सैलाब बन जाएँगे और इस देश को साफ़ कर देंगे!” अन्तिम दृश्य में नायक महज़ इसलिए पकड़ में आ जाता है क्योंकि वह एक छोटी बच्ची को खलनायक से बचाने की कोशिश कर रहा होता है। क्लाइमेक्स में एक अकेले आदमी का बड़ी संख्या में मौजूद पुलिसकर्मियों द्वारा काबू पा लिया जाना भी कुछ हद तक प्रतीकात्मक था।

हमारा तब का सिनेमा बाहरी दुनिया के ज़हरीलेपन से बचने का ज़रिया मात्र नहीं था बल्कि हमें ख़ुद के मुक़ाबले एक व्यापक धरातल से भी जोड़ता था। मानवीयता से जोड़ते हुए एक दिन मोहब्बत, दोस्ती, सामाजिक बराबरी और इंसाफ़ तक पहुँचने की हमारी उम्मीद भी जगाता था।

तिरस्कार को हथियार बना दिया जाना

यह उस दौर से बहुत पहले की बात है, जब हँसने वाले इमोजी को भीड़ द्वारा मार दिये गये लोगों, बलात्कार की शिकार महिलाओं, बर्बरता झेल चुके छात्रों और जेल में क़ैद कार्यकर्ताओं तथा पत्रकारों का मज़ाक उड़ाने के लिए एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा था। और यह उस समय से भी पहले की बात है, जब मनोज मुंतशिर ने मंच पर अकड़कर खड़े होकर दर्शकों को उकसाया कि वे “अहंकार की छाती” में भगवा उतार दें।

राम गोपाल वर्मा की शिवा उसी आधार पर खड़ी हुई जिसे जावेद अख़्तर ने अर्जुन में गढ़ा था। यह ऐसे लड़कों के एक समूह की कहानी थी, जिन्होंने व्यवस्था के आगे न झुकना और उसके खिलाफ़ लड़ना तय किया जो कमज़ोरों के दमन पर टिकी है। अर्जुन में मुख्य मसला बेरोज़गारी थी। वहीं शिवा में मुद्दा था भ्रष्ट राजनेताओं द्वारा छात्र नेताओं को अपने राजनीतिक हितों के लिए हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना।

अर्जुन के दो दृश्य आज भी मौजूँ लगते हैं। एक नौजवान लड़के को भरी बारिश में एक सड़क पर लिंच कर दिया जाता है, लेकिन कोई ध्यान नहीं देता क्योंकि सभी अपने छातों की आड़ में ख़ुद को सुरक्षित महसूस करते हैं। अगला दृश्य है जब अर्जुन अपनी जान बचाने के लिए जिस सड़क पर भाग रहा होता है वहाँ उस नेता के पोस्टर और तस्वीरें सजी होती हैं जो उसकी मासूमियत और आदर्शवाद के दम पर सत्तासीन होता है। वह जिधर का भी रुख़ करता है उसे हाथ जोड़े हुए वही तस्वीर नज़र आती है। दीवारों पर चिपकी, होर्डिंग्स से झाँकती।   

तिस पर भी, फ़िल्म एक उम्मीद की किरण लिए ख़त्म होती है। यह दिखाने के लिए कि व्यवस्था काम करती है अगर आप इंसाफ़ हासिल करने पर आमादा हों। शिवा में अन्त ऐसा नहीं होता। साइकिल का पीछा करने वाले समेत उसके कई दृश्य और शॉट्स अर्जुन से मिलते-जुलते हैं, लेकिन उसका अन्त इस बोध के साथ होता है कि एक गुण्डे के खात्मे के बाद एक दूसरा गुण्डा पैदा हो जाएगा क्योंकि आम भारतीय नागरिकों की ज़मीनी हक़ीक़त में कोई तबदीली नहीं आएगी। 

“अन्दरूनी दुश्मन” को गढ़ना

आज सांस्कृतिक, सिनेमाई और राजनीतिक प्रतीक-छवियों पर काफ़ी हद तक ऐसे उग्र पुरुष किरदारों का वर्चस्व है, जिनकी चौड़ी और उभरी हुई छाती उनकी मर्दानगी का प्रतीक हैं और एकतरफ़ा तरीक़े से लगातार दोहरा कर और कई स्तरों पर हो रहे प्रोपगण्डा के ज़रिये ये छवियाँ हमारी चेतना और हमारे सिनेमा में गहराई तक पैठ बना चुकी है। यह भी हो सकता है कि दर्शक भी बदल गये हों। चौहान और सूर्यवंशी जैसी फिल्में इसलिए सफल होती हैं क्योंकि उनमें दर्शायी गयी क्रूरता में संकोच का कोई पुट नहीं है।

ऐसे किरदार निभाने वाले अदाकारों ने भी ख़ून का स्वाद चख लिया है। वे जानते हैं कि धर्मनिरपेक्षता अब देश की आबो-हवा में नहीं रही। इसलिए वे उसी चीज़ का फ़ायदा उठाने के लिए तैयार हैं, जो आज के वक़्त की माँग है।

जहाँ तक हमारे सिनेमा के इस मुनाफ़े से संचालित विचारधारा की ओर रुख़ करने की बात है, तो कहा जा सकता है कि इसकी शुरुआत अक्षय कुमार की बेबी (2015) से हुई। अक्षय ने अपनी पहली फिल्म सौगंध (1991) के एक विद्रोही प्रेमी युवक से लेकर एक अलौकिक क्षमताओं वाले खिलाड़ी, और फिर कई कॉमेडी फिल्मों के स्टार तक का सफ़र तय किया और उसके बाद सिंह इज़ किंग व नमस्ते लण्डन जैसी फिल्मों से बेशुमार कामयाबी हासिल की, जहाँ उन्होंने विदेशों में भटकते बाहरी व्यक्ति का किरदार निभाया।

उन्होंने लोगों को यह याद दिलाया कि अपनी जड़ों के कटकर वे किन चीजों से महरूम रह जा रहे। उन्होंने दौर के हिसाब से चलन का फ़ायदा उठाया और उसे अपने हक़ में इस्तेमाल किया।

हालाँकि, बेबी एक दूसरे अर्थ में भी प्रस्थान बिन्दु थी। क्योंकि उसने जिस परम्परा की शुरुआत की, वह अब सूर्यवंशी के उस पुलिसवाले के रूप में अपने चरम पर पहुँचती दिखायी देती है, जो राज्यसत्ता की शक्ति का परिचायक है। वह दाढ़ी वाले उन लोगों की आँखों में आँखें डालकर उन्हें धमकाता और धौंस दिखाता है, जिन्हें “अंदरूनी दुश्मन” कहा गया है।

बेबी में दुश्मन कथित तौर पर पाकिस्तान था, लेकिन फ़िल्म ने बहुत बारीकी से दर्शकों की निगाहें मुम्बई के उन घनी आबादी वाले मुस्लिम-बहुल इलाकों की ओर मोड़ दीं, जहाँ “राष्ट्र-विरोधी” गतिविधियों के निशान तलाशे जाने लगे।

सूर्यवंशी में दुश्मन एक सक्रिय होने की प्रतीक्षा कर रहा लश्कर स्लीपर सेल था, जिसमें सम्भावित आतंकवादी बेख़बर भारतीयों के बीच खुलेआम छिपे हुए थे। इसमें कुछ कारों में विस्फोट, हेलीकॉप्टर के हैरतअंगेज़ स्टण्ट और मुम्बई पुलिस पर कुछ चुटीले संवाद जोड़ देने से आपके पास मनोरंजन की आड़ में एक और ‘हम बनाम वे’ वाली कहानी तैयार हो जाएगी।

ट्रेलर में कहीं गांधी का एक उद्धरण भी छिपा हुआ था, लेकिन उनकी अब इतनी ही भूमिका बची है। कुछ उद्धरण, और ख़ास मौक़ों पर चरखे और चश्मे के प्रतीकात्मक इस्तेमाल के लिए।

ऐतिहासिक तौर पर भारत में सफ़ल हुई पुलिस पर बनी फ़िल्में (ज़ंजीर, अर्धसत्य, ख़ाकी, शूल इत्यादि) लगभग हमेशा ही समाज, पुलिस प्रशासन और राजनीतिक व्यवस्था में व्याप्त गन्दगी को दर्शाती थीं। मुख्यधारा सिनेमा से अन्तः दृष्टि ओझल हो चुकी है। साजिश की पड़ताल कर रही बेबी की मुख्य टीम में एक मुस्लिम भी शामिल था। वह भी एक लड़की—शबाना ख़ान, जिसका किरदार तापसी पन्नू ने निभाया था। फ़िल्म में दो जाने-माने पाकिस्तानी कलाकार भी महत्वपूर्ण भूमिकाओं में थे।

फिर भी, इस राष्ट्रवादी शैली में धीरे-धीरे, पर साफ़ तौर पर बदलाव नज़र आ रहा था। आखिर साल 2015 था, और उस समय सभी मुसलमानों को एक ही रंग में रंग देना थोड़ी जल्दबाज़ी होती। इसलिए डैनी डेन्ज़ोंगपा द्वारा निभाये गये फ़िरोज़ अली ख़ान को आतंकवाद-रोधी इकाई का प्रमुख बनाया गया—ताकि आपको यह पता रहे कि फिल्म किसी धर्म के खिलाफ़ नहीं, बल्कि केवल “राष्ट्र-विरोधियों” के खिलाफ़ है।

बेबी से पहले भी अन्धराष्ट्रवाद था। अनिल शर्मा की ग़दर: एक प्रेम कथा, जहाँ नायक के एक हैंड पम्प उखाड़ने से पूरे पाकिस्तान में खलबली मच गयी, और अकेले नायक ने बीवी और बच्चे के साथ वतन वापसी में हज़ारों न सही लेकिन सैंकड़ों का क़त्ल कर दिया। इसके अलावा जॉन मैथ्यू की 1999 की हिट फ़िल्म सरफ़रोश जहाँ एक राष्ट्रवादी एसीपी ग़ुलाम हसन नाम के गायक से भिड़ता है (समझने वाले को इशारा काफ़ी है)।

लेकिन पहले एक भारतीय और एक पाकिस्तानी के बीच की प्रेम कहानी भी थी। और सरफ़रोश में नायक के मातहत काम कर रहा एक मुस्लिम एक ग़ौरतलब बात कहता है—कि उसे अपने धर्म को लेकर हमेशा रक्षात्मक रहना पड़ता है, क्योंकि उससे बार-बार अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए मजबूर किया जाता है।

नीरज पाण्डे की पहली फ़िल्म ए वेडनसडे! का इरादा बिल्कुल स्पष्ट था—आतंकवाद का मुक़ाबला करने का एकमात्र रास्ता आतंकवादियों को बिना किसी क़ानूनी हस्तक्षेप के उड़ा देना है। लेकिन उसमें एक मुस्लिम पुलिस अधिकारी भी था, जो आतंक फैलाने वाले “साँपों” से मुम्बई को बचाता है। फिल्म में ख़तरा एक सीमित दायरे में था, लेकिन बेबी में पाण्डे की कहानी ने 9/11 के बाद के दौर में जॉर्ज डब्ल्यू. बुश की भाँति एक स्पष्ट पक्ष ले लिया—जो हमारे “साथ” नहीं, वे हमारे “खिलाफ़” हैं।

इसके अलावा, अक्षय कुमार द्वारा निभाये गये सुरक्षा एजेण्ट के किरदार में अपने अधिकार और विशेषाधिकार को लेकर एक ऐसा भाव था, जो उसके उपनाम जितना ही भारी था। उसका नाम अजय सिंह राजपूत है (और यहाँ अजय देवगन की चौहान की तरह ही जातिगत दावे का संकेत साफ़ है) और वह आए दिन सिर्फ़ इसलिए मुक्के मारता रहता है क्योंकि वह ऐसा कर सकता है।

एक दृश्य में, वह सहयोग करने के लिए तैयार एक गवाह के जबड़े पर मुक्का मारता है, उसके दाँत उखाड़ देता है और जब उससे सवाल किया जाता है कि उसने ऐसा क्यों किया, तो उसका जवाब होता है— “आदत है।”

वह इसका भी ज़िक्र करता है कि गुजरात दंगों के दौरान उसने कैसे एक मुस्लिम परिवार को त्रिशूल लहराती भीड़ से बचाया था, क्योंकि वह एक अभिमानी भारतीय है। फिर भी, फिल्म में साज़िश रचने वाले लोग केवल मुस्लिम ही हैं। वह भोला-भाला इंजीनियर, जिसका एक समुदाय के नेता ब्रेनवॉश करता है; वह एजेण्ट, जो अपनी वफ़ादारी बदल देता है; और वह आतंकवादी (जिसकी भूमिका में केके मेनन जैसे अभिनेता की प्रतिभा को व्यर्थ कर दिया गया है) जो जेल में बेहतर सुविधाएँ दिये जाने की माँग करता है, क्योंकि उसका दावा है कि उसने कसाब से भी ज़्यादा लोगों की हत्या की है।

मिनिस्टर साब को भी नज़रअंदाज़ नहीं कीजिएगा, जो “बदलाव का चेहरा” कहे जाते हैं और उसकी तरह के ही वेशभूषा में नज़र आते हैं जो “अच्छे दिन” के वायदे करते थे। ब्लैक फ्राइडे के विपरीत, जहाँ आतंकवाद को एक ऐसी त्रासदी के रूप में देखा गया था, जो पूरे समाज को अपने दायरे में समेट लेती है, यहाँ ऐसा कोई समाजशास्त्रीय सन्दर्भ नहीं था। यहाँ बस आतंकवादी थे और उन्हें ढेर करने वाली “बेबी” नाम की एक विशेष कमांडो टीम के सदस्य। बेबी में पीड़ितों के चेहरों पर दिखने वाला वह भयानक, खून से लथपथ मेकअप हो या अक्षय कुमार की कुछ हद तक खटकने वाली नकली मूँछ—इस फ़िल्म ने जिस वैचारिक धरातल पर कदम रखा था, वह भी उतना ही जल्दबाज़ी में और अनगढ़ था।

धुरंधरों की नयी पीढ़ी जानती है की वक़्त ही सबकुछ है, और अब यह आश्चर्य की बात नहीं की वे अन्धराष्ट्रवाद के चेहरे के रूप में अक्षय की जगह ले रहे हैं। उन्होंने बेशक “बदलाव की तस्वीर” का इंटरव्यू लिया होगा और राजनीतिक “मास्टरस्ट्रोक” की फ़िल्मों और ट्वीट्स के ज़रिये जमकर तारीफ़ की होगी, लेकिन उनका वक़्त अब बीत चुका है। अब हमारे पास चालाक अभिनेताओं की अगली पीढ़ी है, जिन्हें वास्तव में किसी नैतिक क़ुतबनुमा की परवाह नहीं है—जब तक मुफ़्त के पुरस्कार बॉक्स ऑफिस पर लगातार होने वाली धमाकेदार कमाई का ज़रिया मौजूद है।

(रीमा मुदगिल का लेख ईन्यूज़रूम से साभार। अनुवाद : वृषाली श्रुति। मूल लेख यहाँ पढ़ सकते हैं।)

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